29 जुलाई 2011

मृत्यु पर्व

 भोपाल की भीषण त्रासदी के बाद
 विश्व कविता समारोह के आयोजन पर्व पर
 गूंजा विख्यात कवि का स्वर
 “मरे हुए लोगों के साथ मरा नहीं जा सकता “
 मनुष्य कहाँ मरता है ?
 मरती है संवेदना
 भोग नहीं मरता
 इच्छायें नहीं मरतीं
 कामना नहीं मरती !
 कौवा , कुत्ता , गाय , ब्राह्मण
 दसवाँ, बारहवाँ, तेरहवीं
 मुंडन ,स्नान , पगड़ी
 पिण्डदान, हांडी , अस्थिफूल
 सब संगम के कूल
 संस्कार है मृत्यु !!
 मणिकर्णिका , गया , गंगासागर
 जिसको जो अनुकूल
 गौदान , सीधा , भोज
 तर्जन , विसर्जन
 सबकी अपनी सोच
 व्यापार है मृत्यु !!
 अर्पण , तर्पण
 संध्या , इक्कीस एकादशी
 क्या हुआ , अगर है ये इक्कीसवीं सदी
 अब इस अवसर की ड्रेस बनती
 त्यौहार है मृत्यु !!
 शोर है जीवन , श्मशान है मृत्यु .
 प्रगटती है अभिलाषा
 अब भी है प्रत्याशा –
 “किसी जगह की मिटटी भीगे ,
 तृप्ति मुझे मिल जायेगी”
 कौन पीये जीवन हाला ?
 मृत्यु अगर हो मधुशाला ?
 उपहार है मृत्यु !!
 पहले आत्मा शरीर को त्याग देती थी
 अब शरीर ने आत्मा को त्याग दिया है
 कठोपनिषद , गीता है ,
 यम है , नचिकेता है
 और कृष्ण का विराट स्वरुप
 शब्द तो सारथि है
 अर्थ असल पारखी है
 कवि परंपरा का निर्वाह करता है
 पितृपक्ष में पुत्र को ही याद करता है
 बेटियों वाले कहाँ जाएँ ?
 क्या हम हैं ‘ब्रह्मराक्षस’ ? 
 'मुक्ति – बोध' के ?
( परिकल्पना पर सर्वप्रथम प्रकाशित )

26 जुलाई 2011


दो जिस्मो के बीच टूटा रिश्ता पड़ा था 
करवट का फासिला  कितना बड़ा था .

बहुत बेजुबाँ थी दिलों की तल्खियां 
अल्फाज था फिर गले में अकड़ा था .

अक्सर करीने से सजे फूलों का ही  
यहाँ बागीचे के बागबां से झगड़ा था .

इसी बहाने पुराने खतों का जिक्र आया
ये याद आया कितने शौक से पढ़ा था .

यादों के बादल तब ही  आँखों में उतरे
दिल में जब बहुत उमड़ा -घुमड़ा था .

आओ उसे फिर उन्ही गलियों में ढूंढे  
बचपन के खिलौनों का टूटा टुकड़ा था .

कच्ची नींद का ख्वाब सिरहाने बैठा रहा  
जिसे अधूरा समझा वही पूरा गढ़ा था .

20 जुलाई 2011

Terror attacks and our public spaces

We blame the intelligence, the politicians, the police, the bureaucrats - all and sundry. Life in the city moves at such a fast pace that we have no option but to go on with our lives, almost as though the death-fest never took place. Some call it the spirit of the city; for most, it is a necessity. The media covers it 24x7,feeds on every minute detail and, at times, even goes on to exaggerate. The same news is broadcast-ed simultaneously on almost every channel 24/7 and yet they label it "exclusive". 

But that is not what my thoughts are at this moment. I too have been bombarded with all the above, and my brain was numb from the assault. Have a pause and a take a look at our cities and our surrounding everyday life. What do we see? We see shops which are not treated more than a box, the goods jut out every morning strewn and stretched, and footpath space becomes extension of shops. What little is left is occupied by hawkers. The taxis are parked everywhere, so are cars, trucks , Hand-carts, bikes, Pull-carts, Autos, buses. Families live, ambulate on any available space. As if everyone is on lookout for a niche and grabs it as soon as it appears. Cows, Dogs, Bulls, Goats, at times monkeys, and roosters also vie for space. Our markets, stations, parks, buses, trains, and even some airports are too crowded for comfort. Are we too populated, over populated? Why we always under-plan. Our shops are inadequate. We do not like to buy another shop and expand. Our natural tendency is to expand the goods and cover surrounding areas. We do not have adequate buses or trains forcing people to travel like cattle. Everywhere utter chaos rules. Nothing seems to be out of place. No person, no vehicle, no goods. 

For the terrorist, a perfect place, to quietly leave a bag or an umbrella or a pressure cooker or a radio or a Tiffin-carrier and still not be noticed by anyone in the crowd. Nothing ever seems out of place. Nothing looks odd. Not even a bomb. 

We take our civil liberties too seriously. We treat the public spaces as an extension of our living spaces. We stretch ourselves everywhere. As long as our public spaces look inviting to jingle and mingle, we should be prepared to such acts being perpetuated upon us. Not that an organised civic space will be any less prone to such attacks. But to some extent it will make the perpetrators task a little difficult, if not impossible. Let’s get a little organised and show some respect for civic discipline and respect for rules. We should not lower our guards ever. Always remember - We have to be successful in saving our lives all the time and the terrorist has to succeed just once. 

16 जुलाई 2011

सादा कबूतर

शब्दों में बेबसी , बेचारगी , गुस्सा हो 
पहले नहीं देखा कभी  वो इतना डरा हो ||
लीडरान की चाक -चौबंद हिफाजत हो 
देखो न आसपास भी, वो सिरफिरा हो ||
मुंडेर पर नहीं दिखा वो सादा-कबूतर 
हो न हो किसी बाज के पंजों ने धरा हो ||
आँखें जागने से लाल हैं या खून उतरा है 
रात बड़ी कश्मकश से शहर गुजरा हो ||
आँखें खोलो तो बाज़ार की लाशों का मंज़र 
बंद करूँ तो सामने उसी बच्चे का चेहरा हो ||
चार सू आवाजें दीं सब लौट के आती हैं 
ये शहर जैसे हर सू पहाड़ों से घिरा हो ||
जो  धमाका  हमारे  कान सुन्न कर गया 
कई घरों  में अबतक सन्नाटा पसरा हो ||

12 जुलाई 2011

फेसबुक पर कविता

कुछ बच्चे गोद में हैं
कुछ घुटनों के बल चल पड़ें हैं
कुछ बाग में खेल रहे हैं
कुछ विद्यालय आ जा रहे हैं
कुछ ऊँची क्लास में हैं
कुछ कालेज कुछ विश्वविद्यालय में हैं
कुछ कंपनी कुछ घर में हैं
कुछ प्रेमी के साथ घूम फिर रहे हैं
कुछ शादी के द्वार पर हैं
कुछ की बातचीत जारी है
कुछ की तैय्यारी है
फिर शादी के दो-चार साल बाद यही कहानी दोहराई जायेगी
प्रथम जन्मे शिशु का उल्लास
पहली छवि , प्रथम  हाथों में लेने  का अहसास
उसकी प्रथम किलकारी
पहला कदम
स्कूल में पहला दिन
पहली यात्रा
जब उसने पहली दौड में हिस्सा लिया
यह पहली ट्राफी , पहला खिलौना , पहली गाड़ी
बहुत चाव से दिखाए जायेंगे
हमारी सगाई , शादी , हनीमून, यात्रा की तस्वीरें
पहली नौकरी
पहली बेरोजगारी
पहली गाड़ी
पहला मकान
पहली विदेश यात्रा
दोस्त के साथ बरसों बाद मुलाकात
खोये हुए दोस्त से मिलने का उत्साह
स्कूल कालेज से बिछड़े दोस्तों के बदले हुए चेहरे
कुछ इसी शहर में , कुछ बहुत दूर , कुछ देश , कुछ विदेश में
हर गतिविधी पर नजर , हर टिप्पणी पर प्रतिक्रिया
कुछ पसंद कुछ मजाहिया
कुछ ब्लाक , कुछ खुला
दो तरह के लोगों के लिए दो चेहरे - दो जीवन
जन्मदिन वर्षगाँठ की बधाई
वही सिलसिला , वही शिकवे वही गिला
कभी इधर आओ , कभी मिलो .
लड़का न्यूयॉर्क , लड़की पेरिस में हैं
बड़ा घर सांय-सांय  करता है
परिवार फेसबुक पर मिलता है
वही दुआ सलाम , वही सुप्रभात , वही शुभरात्री , शब्बाखैर
बूढ़े बरगद के नीचे अब कोई इकठ्ठा नहीं होता
पास की बावड़ी का पानी मैला है
बरगद के पास हरसिंगार अकेला है
रातरानी नहीं खिली
कोयल की तान सुनी-अनसुनी
गावँ शहर के लोग इधर नहीं आते
किसी ने कहा - वहाँ ब्रह्मराक्षस रहता है .

6 जुलाई 2011


रोजनामचा - यानि दिनचर्या , यानि वह कहानी जो रोज लिखी जाये
जमा की , खर्च की , हिसाब की
कोई रोज जन्मता है
कोई रोज मरता है
और कोई बस एक रोज जीता है
बस उसी का चर्चा है .

जरूरी नहीं की गुजरना हो
हर सोने को तपना हो
किसी को आग की भट्टी
जला के राख कर दे .

कलम के जौहर लड़े जायेंगे
कुछ मसविदे तैय्यार होंगे
कुछ शब्द हथियार होंगे
कुछ अर्थ विस्तार होंगे
अपनी अपनी सहूलियतें देखी होंगी
सबकी वसीयतें होंगी .

हम सब एक घने जंगल से गुजरतें हैं
हम सब अँधेरे से डरते हैं
शाम होते ही घर याद आता है
कभी हंसी आती है
बस वहीं होना तरोताजा है
और डर भगाना है .

कितनी भी ताकीदें हों
अजीब वाकयात हों
डरावनी तस्वीरें हों
आईना हमारे चेहरे रोज पढता है
सामने खड़ा शख्स बहुत संवरता है
अन्दर कोई भूत छुपा है
जो आँखों में ढल जाता है
लाल लाल जलता है
मुखौटा बदल जाता है
किसी मेले में ख़रीदा था
राजा का वजीफा था .

अपनी परछाईं पहचान नहीं पाता
आदमी अपने साये से डरता है
कभी बादल डराता है
कभी रस्सी
कभी किसी आहट पर
सांस गले में अटकी
अपने ही घर में
एक कोने से दूसरे भागता
किससे पीछा छुड़ाता?

चाशनी में भीगो कर परसे हुए शब्द
में छुपा सारा विष बह निकला
अर्थ होमिओपैथी के छोटे छोटे दाने निकले
छुपे हुए रोग को उजागर कर दिया
सुन्दर सा चेहरा , अचानक बिखरा
मुख म्लान हो गया
मौसम की तरह बदला .

सड़क पर बदहवास भागता
शहर , जंगल की तरह फैलता है
फिर उसी की तरह जलता है
हर सुबह का अखबार
अंदेशों से भरा , आता है बालकनी में
रोज वही क़त्ल , हत्या , झगड़े ,फसाद , खून खराबा
रोज वही झूठ , वही प्रहसन , दिखावा

प्रसंग बदलते हैं
किरदार बदलते हैं
रोजनामचा नया नहीं होता .
जीवन जीवन है
नाटक विकल्प नहीं
मत बनो
किसी निदेशक के हाथ की कठपुतली
क्यों न हों कितने भी जानदार
मत दोहराओ संवाद ऊधार के
शब्दों को खोखला होने से पहले बचा लो

तुम्हारी जिन्दगी का पन्ना है
थाने की डायरी नहीं
जो झूठ का पुलिंदा हो .

4 जुलाई 2011

कुछ यूँ ही

जमीं पर उतरे चाँद से बतियाता है कौन
स्निग्ध चांदनी में है ये किसका मौन
किसने साहिल पे बिखेरी चांदी की रेत
इन पत्तियों पर खिला किसका स्वेद
हिमाच्छादित चोटियों पर किसका तेज
हजारों रास्ते कौन सा उससे आमेज
चलो फिर इन घाटियों में ढूंढें खोई हवा
हमारी बस्तियों से रूठ कर निकली सबा
फिर  पुरनम आँखों से हुआ विसाल
पत्थर से बादल टकराए बरसे हिमाल
गर्मिए ग़म से निकले कितने चेनाब
दौड़ता  दरिया सागर से मिलने बेताब
फिर इन चश्मो  से निकलें मौजें बहारां
गूंजे यहाँ उसके जलवों का लश्कारा.

1 जुलाई 2011

पावर दूरी सूचकांक और भ्रष्टाचार - V Raghunathan

नागरिक समाज और सरकार के बीच अलग अनुचित भारी विवादों के बावजूद की - कोई बिल, मसौदा किसका है, भ्रष्टाचार किसी भी समय जल्द ही तय होने वाला नहीं है. , जब तक कि हम भ्रष्टाचार से अन्य संबंधित मुद्दों से निपटने के लिए ,एक लोगों के रूप में खुद को तैय्यार कर पहल की शुरुआत नही करते .

स्पष्ट तौर पर नही , लेकिन भ्रष्टाचार से संबंधित दो मुद्दे हैं : सत्ता दूरी सूचकांक और उससे उपजी , 'वीआईपी' संस्कृति जो कि हमारे जीवन के सभी पहलुओं पर व्याप्त है . जब तक हम इन दो मापदंडों को चुनौती दें , जो हमारी संस्कृति का पर्याय बन गए हैं , मूलरूप में ज्यादा कुछ नहीं बदल सकता है.

सत्ता दूरी सूचकांक क्या है? ( पावर दूरी इंडेक्स - GH Hofstede से उद्धृत ) किस हद तक समाज के कम शक्तिशाली सदस्य स्वीकार या उम्मीद करते हैं : शक्ति का असमान वितरण होना. और सत्ता असमानता को उच्च स्वीकृति या उम्मीद उतनी हे ऊँची उच्च शक्ति दूरी. आमतौर पर, यद्यपि विशेष रूप से नहीं, विकसित देशों सत्ता दूरी सूचकांक कम है.

यही कारण है कि एक न्यूयॉर्क की गगनचुंबी इमारत में चौकीदार शीर्ष मंजिल पर कोने के कार्यालय में सीईओ को “ हाई! कैसे हो बिल ?” बुलाने से पहले कुछ नही सोचेगा ! या सुरक्षा गार्ड भी, देश के एक एक हवाई अड्डे के सुरक्षा द्वार पर देश के उपराष्ट्रपति की सहजता से तलाशी ले सकता है. इसके विपरीत, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, चीन, कोरिया, भारत, पाकिस्तान, कई अफ्रीकी देशों और दक्षिण अमेरिकी देशों के कई तरह सामंतवादी देशों शायद उच्च शक्ति दूरी का प्रतिनिधित्व करते हैं, क्योंकि इन देशों में या तो अधिक निरंकुश, सामंतवादी या माई-बाप व्यवस्था हैं.

सत्ता दूरी के विचार का मूल्यांकन किया जा सकता है इस बात से कि सामान्य रूप से ग्रामीण भारत में, किसी भी वर्दी में किसी को भी , आसानी से एक महान अधिकारी के रूप में स्वीकार किया जाता है. बिहार, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में, उदाहरण के लिए, यह असामान्य नहीं है एक ग्रामीण साइकिल चालक उतर जाता है और सड़क पर एक तरफ खडा हो जाता है जब कोई एक सरकारी अधिकारी एक जीप से गुजरता है क्योंकि उसके पास जीप एक सत्ता के प्रतीक के रूप में है और इसलिए शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है. हमारे शहरों में भी, किसी को भी सफेद खादी में देख कर सरकारी कार्यालयों में त्वरित आज्ञाकारिता और आदेशों में देखा जा सकता है , सहज .

इस तरह हमारे देश में सत्ता की दूरी समीकरण है कि लगभग गोरी वर्दीधारी दो ग्रे सफारी पहने आदमियों के साथ साथ , देश में किसी भी कतार को / किसी को भी , कूद सकते है. उच्च शक्ति दूरी सूचकांक कारण है कि एक सफेद राजदूत शीर्ष पर एक लाल बत्ती के साथ आतंकवादियों से भरी कार संसद की सुरक्षा के माध्यम से जूम कर सके. यह भी कारण है कि घरेलू कर्मचारियों को नियमित रूप से सेवकों (बंदी या दासों से प्राप्त) के रूप में भेजा जाता है और इसके लिए बद्जाती इलाज किया जाना है (और हमारे राजनयिकों नियमित रूप से विदेश में अपने कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के लिए अभियुक्त हो) जारी है. यह भी कारण है कि सत्ता के आदी उनसे पूछताछ के लिए कभी तैय्यार नहीं मिलेगा, क्योंकि हम स्वीकार करते हैं और उम्मीद करते हैं कि वे सवाल किया जाना पसंद नहीं करेंगे. यही कारण है कि सत्ता की दूरी में नीचे पुलिस का अदना सिपाही एक शीर्ष कार्पोरेट या राजनीतिक मुखिया से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता है (जब तक सुप्रीम कोर्ट दखल ना दे , बिल्कुल).

भ्रष्टाचार और सत्ता के बीच की दूरी संघ काल्पनिक नहीं है. सत्ता दूरी सूचकांक और देशों के भ्रष्टाचार सूचकांक का मूल्यांकन एक उच्च सहसंबंध (भ्रष्टाचार सूचकांक , पेंगुइन, 2010) दिखाते हैं. आमतौर पर, देशों है कि उच्च शक्ति दूरी है भी अधिक भ्रष्ट और इसके विपरीत. तो हमें सत्ता दूरी सूचकांक के खिलाफ लड़ने की जरूरत नहीं है.

सत्ता दूरी इंडेक्स का अन्य ज़बरदस्त चेहरा हमारे तुम्हारे चेहरे में, 'वीआईपी' संस्कृति है. 'वीआईपी' और कमतर मनुष्यों - दो अलग लोगों की दो टोली के लिए , एक तथाकथित लोकतंत्र में, 'वीआईपी' पट्टिका हम नियमित रूप से स्वीकार करते हैं एक लोगों के रूप में, हम पर्याप्त रूप से शर्मिंदा हो सकते है . और बाहर से बांटने के उपचार की उम्मीद नहीं लगती.

एक औसत हवाई अड्डे पर एक नजर डालें - वहाँ 'वीआईपी' सुरक्षा इलाज हो सकता है (के लिए वहाँ कोई सुरक्षा जांच की जा रही अनुवाद होगा), 'वीआईपी' लाउंज, 'वीआईपी' उत्प्रवास, 'वीआईपी' आप्रवास, 'वीआईपी' पार्किंग, और आपके पास क्या है . एक पुलिस थाने में जाकर अपनी एफआईआर यदि आपकी शिकायत एक 'वीआईपी' के खिलाफ जा दायर नहीं करेंगे, या यदि आप एक 'वीआईपी' नहीं हैं. कतारों कि एक दिन के लिए दिन के जीवन में देखता है की कोई नहीं या तो पासपोर्ट कार्यालय के सामने, आरटीओ कार्यालय, भूमि पंजीकरण कार्यालय या किसी अन्य प्रणाली है जहाँ एक कतार साधारण मनुष्यों के लिए आवश्यक है, अति विशिष्ट व्यक्तियों पर लागू होते हैं.

अति विशिष्ट व्यक्तियों कम न्याय प्राप्त करने के लिए इंतजार करेंगे. अति विशिष्ट व्यक्तियों जेल के पीछे एक ही अपराध के लिए कम समय बिताना होगा. हम एक बहुत ज़्यादा देर में एक समारोह के लिए 'वीआईपी' के लिए घंटे और घंटे इंतजार करेंगे. यहां तक ​​कि एक निजी शादी स्वागत एक कतार पासिंग द्वारा 'वीआईपी' है. एक 'वीआईपी' सड़क यातायात में बाधा डाल सकते हैं. एक 'वीआईपी' के बारे में एक पायलट का आदेश, अन्य यात्रियों की जान खतरे में डाल सकता है. एक 'वीआईपी' लाल बत्ती (यह केवल क्षेत्र है जहां कम मनुष्यों सममूल्य पर कम या ज्यादा 'वीआईपी' के साथ कर रहे हैं के बारे में है) कूद सकते हैं. एक वीआईपी, यहां तक ​​कि एक करोड़पति, राज्य से मुक्त सुरक्षा पाता है. एक पर जा सकते हैं | एक 'वीआईपी' के लिए क्रिकेट मैच, या अन्य प्रमुख कार्यक्रम जैसे सार्वजनिक आयोजनों के लिए लगभग कभी कोई भुगतान नहीं करना पड़ता है.

शायद 'वीआईपी' हर समाज में मिलता है अलग ढंग से, लेकिन कहीं 'वीआईपी' संस्कृति के रूप में हमारे समाज के रूप में जैसा ज़बरदस्त है. अभ्यास आमतौर पर एक अधिक सूक्ष्म बहुत कुछ है. सभ्य दुनिया में कहीं भी किसी देश में अपने ही लोगों साथी मनुष्यों से द्वितीय श्रेणी के नागरिक जैसा व्यवहार दिखाई पड़ता है. जो भी हो संवैधानिक समानता का क्या हुआ? सभ्य समाज में कहीं एक निर्देशक या चेतावनी संकेतक पट्टिकाएं 'अति विशिष्ट व्यक्तियों के लिए' कह रही है देखा नहीं है. यह संभव है कि समाज में 'वीआईपी' संस्कृति पर लगाम लगाने के क्रम में सत्ता की दूरी सूचकांक कम करना चाहिए. यदि 'वीआईपी' प्रणाली असुविधाजनक बन जाए, इसे बदलने की स्थिति के बजाय जनता से इसका अनुसरण करने की उम्मीद है, और खुद को उन्मुक्ति प्रदान करने के बजाय, इसका समर्थन कर रहे हैं.

तो जाहिर है, जब तक कि हम में से हर एक को स्वीकार करने और सत्ता दूरी की खाई को पटाने की उम्मीद करना बंद हो जाता है, और इस अंतर को पूरना शुरू होता है, जब तक हममें से प्रत्येक को विश्वास है कि वहाँ कुछ के लिए एक इलाज के प्रथम श्रेणी और दूसरों के लिए एक इलाज के तृतीय श्रेणी का नहीं किया जा सकता है शुरू होता है , लोकपाल विधेयक अकेला बहुत कम हासिल कर सकेगा
 . "मूल लेख के लिए यहाँ क्लिक करें.Power Distance Index and Corruption " (Google translate - की मदद से साभार )

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